सोमवार, 11 जनवरी 2016

चाँद के साथ एक रात

चाँद हमेशा ही प्यार की निशानी रहा हैं हमेशा दिल ही की तड़प में प्रिय का साथ देता हैं ।  प्यार के इस अहसास को चाँद बिन कहे ही समझता हैं । कोई साथ हो न हो चाँद हमेशा आँसू पोंछता हैं ।
"...तो आज फुरसत भी है, और तनहाई भी,
आ चाँद बैठकर गुफ्तगू करते हैं,
कुछ हाल-ए-बयाँ हम करते हैं,
एहसास-ए-दिल शेयर करते हैं,
तेरे शिवा कहें तो कहें किससे ?
क्योंकि,
कुछ तो कामन है अपने में ...
आगाज-ए-बयाँ कहाँ से करें ?
चलो फ्लैश बैक करते हैं,
बचपन में चलते हैं,
जब तू अपुन का मामा हुआ करता था..."
सबसे पहले तो वो याद आता है जब हम रूठ जाते तो माँ हमको मनाते हुए चंदा मामा को दिखाकर हमें सुलातीं थी...
गाना गाती थीं ..."चंदा मामा दूर के ...किया पकाये पूर के ...आप खाये थाली में ...मुन्ना को दे प्याली में ..."  वैसे इसकी यादें बहुत ही धुंधली या यूँ कहें न के बराबर की यादें हैं ...
सूरदास जी ने भी तो लिखा है ..." मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों... जैहों लोट धरनि पर अबहीं तेरी गोद न ऐहों..."
अब चंदा को ही देख लीजिए ...बचपन में हमारे मामा थे, आराधना मूवी की माँ अपने बच्चे में उसका अक्स देखती है ..."चंदा है तू , मेरा सूरज है तू ..."
और अब, जबकि हम युवा हो गये तो चंदा की तुलना अपने महबूब से करने लगे कोई शिकायत हो तो उसी को दृष्टिगत रखकर करते हैं ...जैसे जब हम रात भर जगें और कोई साथ देने वाला न हो तो ...चांद साथी बन जाता है ...क्योंकि हम उससे कह सकते हैं कि ..."चांद को ढूंढे पागल सूरज , शाम को ढूंढे सबेरा , मैं भी ढूंढू उस प्रियतम को हो न सका जो मेरा..." तो रात को जागकर अक्श-ए-महबूब चाँद में ही देखकर शिकायत करते रहते हैं ...जैसे रात भर वो जागता है हम भी जागते हैं ...लेकिन एक अंतर है ...वो जलता नहीं शीतल रहता है ...पर वियोगी युवा मन आफताब की तरह जलता है शीतल रात में भी ...
"...हम भी बेकरार,
तू भी बेकरार;
तुझको न चैन,
न मुझे करार;
तू बेचैन आफताब के लिए,
और मैं अपने माहताब के लिए;
हम दोनों की आंखों में नीदें ,न दिल में करार ;
किसने चुराई नींद-ओ-करार ?
फिरभी ये चैन की कोई तो है साथी-ए-तन्हाई..
शुक्रिया चंदा..."
फिर मन किया लाओ थोड़ा चापलूसी कर दूँ चाँद की, नहीं तो उठकर अगर चल दिया तो हम हाल-ए-बयाँ किससे करेंगे  ?
"...ऐ चाँद ! इतराये न क्यूँ तू ?
क्योंकि तेरे मौन ने ललकार कर पुकारा है
 सब आशिक हैं तुम्हारे, कौन हमारा है ?
 नूर-ए-बरसात होती है तुझसे,
 चिलमन भी न छुपा सके ऐसा रूप है तुम्हारा,
तुम नहीं तो चाँदनी कहाँ ?
मुहब्बत ने भी तुम्हीं को पुकारा है,
माहताब हो,  ख्वाब हो, धड़कते हो दिलों में,
सहारा-ए-आशिकी हो,
नहीं तो रात की तनहाई में कैसे होता गुजारा,
शायरी मंझधार में ही डूब जाती,
कलम के शाहिल बन जाते हो,
व सम्बल हमारा,
और तो और दिलों पर राज है तुम्हारा
इसीलिए ,
ऐ चाँद ! तू सबसे है न्यारा ..."
"...ऐ चाँद ! तथागत जब आये तो तू पूरे शबाब पर था, और गये तब भी ...क्या इसीलिए उनकी आँखों करूणा व प्रेम छलकता था...हमारे यहाँ माँ हमें चाँद को देख मनाती और चाँद को फीका कहती हमसे ...तो तुझे ही देख सुहागन करवा-चौथ व्रत तोड़ती...अब ये भी देखो कमाल हो जाता है, मुस्लिम भी ईद का चाँद देख निहाल हो जाता है..."
...फिर मैने सोचा कि लाओ मेरी बातों में मशगूल चाँद को छू लूँ
होकर बेकरार मेरी भावनाओं में एक ज्वार आया..
आगे बढ़ती लहर लहर
आकाश की तरफ़
भूला मैं मर्यादा
ऊपर और ऊपर
शैलाब सा आ गया जज्बात का,
लेकिन ये क्या ?
माहताब तो दूर बहुत दूर
हम छू न सके
लहरे बिखरकर गिरीं रेत पर
जज्बात बिखर गये
मैं हारा, थका , स्तब्ध,
होकर असफल
लौटा उसी जगह
बिल्कुल शान्त और क्लांत,
कुछ समय विचार शून्य,
बचा सिर्फ चाँद का अक्स
सिर्फ अक्स , अपने ही भीतर
बस महसूस बस महसूस ..."
...फिर सोच की दिशा बदली और चाँद का एक और ही रूप पाया...
...कितनी नाइंसाफी करते हैं हम चाँद के साथ,
 सदियों से ‘नाइट-शिफ्ट’
‘वीकेन्ड’ पे भी फुरसत नहीं,
मंथ में वनली वन हॅालीडे,
उसी में सब करना
कपड़े धुलना व सुखाना,
जब वो बहुत परेशां
तो चन्द्रग्रहण के दिन वो
झूठी ‘सिक-लीव’ पर चला जाता
अरे उसको भी तो आराम चाहिए ?
करे भी का बेचारा,
पूरी रात जागता,
सांसद तो अपना बेतन बढ़ा लेते,
पर उसका सदियों से फिक्स,
इसीलिए 'सैलरी-डे’ वाले दिन
चाँद कुछ ज्यादा ही चमकता है
फिर जैसे घटती ‘सैलरी’ वैसे वो चमक घटाता जाता है,
लेकिन हमरा समझ में नहीं आता है ?
क्यूं लोगों को
चाँद में माशूका नजर आता है ?
मुझे तो दिखता है
वो हैरान, परेशान
पूरी ड्यूटी के बाद भी
जिसकी सेलरी कम है
और वो भी बिना मुट्ठी गरम् किये नहीं पाता,
अब बताओ चांद भी हमारे देश के क्लर्कों से परेशान,
अब वो मुंशिफ-ए-तकदीर से फरियाद करने को सोच रहा,
कि हमका भारत से रुख्सत कर दो
ये लोग बहुतै करप्ट हैं ..."
फिर भावना का हिलोर उठा और फना होने का मन करने लगा, ऐ चाँद ! तू भी तो सूरज को खोजता फिरता है ...तो मैं क्यों न...???

"...चलो कुछ नापते हैं
तुम जरा चाँद वाली छोर पकड़ना,
हम सूरज वाली पकड़ते हैं,
देखें कितना फासला है हम दोनों के दरमियाँ ,
और फिर सिमट जाए दूरी इतनी कि
फसला न रहे माहताब-ओ-आफताब में ,
कोई डोर ना बचे दरमियाँ...
दूरियाँ हमारे बीच की न रह जाएँ,
हम एक हो जाएँ,
कोई सिरा न खोज पाएँ,
आओ कुछ ऐसे ही मोहब्बत करते हैं ,
चलो चाँद व सूरज को फना करते..."

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