शुक्रवार, 29 जून 2012

सर्वधर्म-समभाव / वसुधैव-कुटुम्बकम / secularism

secularism अर्थात पंथनिरपेक्ष या धर्मनिरपेक्ष शब्द काफी विवादित रहा है, अतः आइये इस पर विचार करें|

मध्यकाल में secular शब्द का विकास यूरोप में चर्च और राज्य के द्वंद्व से हुआ,इसलिए वहाँ पर राज्य के सभी मामलों से धर्म का पूर्णतः निषेध ही secularism कहलाया,जो आधुनिक विश्व को यूरोप की महान देन है|       

लेकिन हमारे देश में ऐसा कुछ नहीं है| secular शब्द का ठीक-ठीक हिन्दी पर्याय ही नहीं उपलब्ध है,यद्यपि इसे पंथनिरपेक्ष अनूदित किया गया है| हमारे यहाँ धर्म और राज्य का द्वंद्व कम सहयोग ज्यादा रहा है| अतः इसका विकास सर्वधर्म-समभाव और वसुधैव-कुटुम्बकम के रूप में हुआ| आइये इसके अनुसन्धान के लिए इतिहास और धार्मिक साहित्यों में गोता लगाते हैं|

सम्राट अशोक के १२वें शिलालेख में उन्होंने धर्मसार-वृद्धि पर बल दिया है और कहा कि लोग अपने संप्रदाय की प्रशंसा और दूसरे संप्रदाय की अकारण निंदा न करें, क्योंकि ऐसा करके वे अपने संप्रदाय की हानि व दूसरे संप्रदाय से विद्वेष को बढ़ाते हैं, इसके विपरीत किसी न किसी अच्छाई के कारण उन्हें एक दूसरे के संप्रदाय  को सुनना और आदर देना चाहिए जिससे सभी धर्म बहुश्रुत होंगे और उनमें सौहार्द बढ़ेगा, इसका मूल वे वाचागुटी अर्थात वाणी-संयम बताते है... यद्यपि अशोक का व्यक्तिगत धर्म बौद्ध था|

गुप्तकाल में संस्कृत के हर क्षेत्र में समन्वय-ही-समन्वय दिखता है, वहाँ पर हरि का हर से, हिन्दू धर्म का बौद्ध व जैन धर्म से समन्वय अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गया जो हमारे लिए गर्व का विषय है, गुप्त सम्राट वैष्णव थे लेकिन उनके समय में अजंता के १६-वीं ,१७-वीं गुफाओं की चित्रकारी हुई जो मुख्यतः बौद्ध धर्म से सम्बंधित है, और इसी समय प्रसिद्ध सारनाथ व सुल्तानगंज की बौद्ध मूर्तियों का निर्माण हुआ|

इसी तरह मध्य काल में जैन-उल-आबदीन, सम्राट अकबर, दाराशिकोह, महाराणाप्रताप, छत्रपति शिवाजी आदि के व्यक्तित्व में भी यही भाव मिलता है| 

इस तरह हम भारतीय इतिहास से जितना चाहें उतना उदहारण बढ़ा लें निष्कर्ष यह है कि सम्राट सभी धर्मों के प्रति समभाव रखते थे,उनका व्यक्तिगत धर्म कुछ भी क्यों न रहा हों|
     
अब आइये कुछ धार्मिक साहित्यों पर दृष्टिपात करतें हैं- 

"हे अर्जुन! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं,मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं||गीता,४/११||

"यदि तुम सबल हों, तो वेदान्त दर्शन को ग्रहण कर स्वाधीन हो जाओ| यदि तुम वह नहीं कर सकते तो ईश्वर कि उपासना करो; यदि वह भी नहीं तो किसी प्रतिमा कि पूजा करो| यदि वह भी करने की शक्ति तुममे न हो तो लाभ के विचार से रहित होकर कुछ शुभ कर्म करो| तुम्हारे पास जो कुछ भी है, वह सब प्रभु की सेवा में समर्पित कर दो| लड़ते रहो|| स्वामी विवेकानंद||"

"पत्र, पुष्प, फल और जल-मेरी वेदी पर कोई व्यक्ति जो कुछ चढ़ाता है, मैं उसे सामान भाव से प्रसन्नतापूर्वक  ग्रहण करता हूँ||गीता,९/२६||"

"सचमुच वही ऋषि और पंडित है, जो विद्या व विनय से युक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चंडाल में सम-दृष्टि रखता है| जिसका अन्तःकरण समता में अर्थात सब भूतो के अंतर्गत ब्रह्मरूप समभाव में निश्छलतापूर्वक स्थित हों गया है, उसने जीवितावस्था में ही पृथ्वी,स्वर्ग आदि समस्त लोकों पर विजय पा ली है; और चूँकि वह ब्रह्म निर्दोष और सम है,इसलिए जो समदर्शी एवं निर्दोष हैं;वे ब्रह्म में ही स्थिति कहे जाते हैं||गीता,५/१८-१९||"

"यही नैतिकता का सार है- सब के प्रति साम्य|"

इस तरह जब हम यह मान लेते हैं कि "एकं सत्  विप्रः बहुधा बदंति||ऋग्वेद||" और "ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या" तथा वह तुम्ही हो(तत् त्वं अस् व अहम् ब्रह्मासि)| "सियाराम मय सब जग जानी|" अर्थात सारा जगत  ईश्वर-मय है और सभी लोग उसी सत् को स्वं को अपने-अपने तरीके से खोजने में लगे हैं तो फिर साम्प्रदायिकता व धार्मिक विद्वेष जैसे प्रश्न स्वतः ही अप्रासंगिक हो जाते हैं और इसी में निहित है सर्वधर्मसमभाव व वसुधैव-कुटुम्बकम कि अवधारणा| इस प्रकार यह स्पष्ट रूप से secular शब्द से व्यापक है| 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें