••• सहिष्णुता बनाम असहिष्णुता •••
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भारत हम सबका है, धर्म का मामला व्यक्तिगत है, लोकहित व देशहित सर्वोपरि है , धर्म इसके आड़े नहीं आना चाहिए।
"धर्म की सार्थकता समाज को जोड़ने में है न कि उसे तोड़ने में "। ...
... धर्म है-
"परहित सरिस धर्म नहिं भाई।
परपीड़ा सम नहिं अधमाई।।"
परन्तु धर्म का अर्थ ही हम कुछ और लगा बैठे हैं। धर्म के नाम पर एक दूसरे की हत्या अस्वीकार्य है। ये धर्म नहीं अधर्म है।
भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा है -
"सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुखभाग भवेत्।।"
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सहिष्णुता का अर्थ है- सहनशीलता , अर्थात् ऐसे विचारों के प्रति भी सहनशील होना जिससे असहमति हो । इसके अलावा दर्द को बर्दाश्त करना, विषम परिस्थितियों में धैर्यवान रहना भी सहिष्णुता है। परन्तु सहिष्णुता व असहिष्णुता का प्रयोग अब अधिकतर विचारों व धर्मों के प्रति सहमति व असहमति से लगाया जाता है। इस संदर्भ में धार्मिक सहिष्णुता/असहिष्णुता (religious tolerance/intolerance), नस्लीय सहिष्णुता /असहिष्णुता( racial tolerance/intolerance) जैसे शब्द अक्सर सुनने में आते हैं।
हाल में ही अभिनेता आमिर खान के बयान ने हंगामा बरपा दिया , उनके बयान में यह झलक रहा है कि भारत का माहौल दिनों -दिन खराब होता जा रहा है और लोग धार्मिक रूप से सहनशील कम होते जा रहे हैं।
सहिष्णुता - असहिष्णुता के मुद्दे को लेकर संसद से लेकर सड़कों तक बहस जारी है।
मूल प्रश्न यह है कि, क्या सचमुच हम(भारतीय) असहिष्णु होते जा रहे हैं ?
इसे समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा और साथ ही विश्व के अन्यान्य देशों पर भी दृष्टिपात कर लेना चाहिए। फिर तस्वीर साफ होगी कि क्या सचमुच हम असहिष्णु होते जा रहे हैं या फिर ऐसे आरोप सच से परे हैं।
पहले हम अतीत में लौटते हैं। हमारे देश में लोकनायक वही हो सकता है जिसमें समन्वय की अपार क्षमता हो। महात्मा बुद्ध हो , सम्राट अशोक हो ,बादशाह अकबर हो या फिर महात्मा गाँधी । साहित्य के क्षेत्र में गोस्वामी तुलसीदास ने समन्वय का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया है।
हमारा भक्ति आन्दोलन और सूफी आन्दोलन भी इसी का उदाहरण है। जिसने भी मलिक मुहम्मद जायसी के पद्मावत को पढ़ा होगा उसे ये ज्ञात होगा कि एक सूफी कवि फारसी के स्थान पर अवधी भाषा में काव्य रचना करता है और वह हिन्दू देवी देवताओं का गुणगान करते हैं। जायसी की सहानुभूति अलाउद्दीन खिलजी के साथ नहीं बल्कि राणा रत्नसेन के साथ है।
दो सहस्राब्दी पूर्व सम्राट अशोक ने अपने शिला प्रज्ञापनों में धार्मिक-सहिष्णुता के सम्बन्ध में जो बातें लिखवायी थी वो आज भी प्रासंगिक व सम्पूर्ण संसार के लिए दिशाबोधक हैं। ...वो कहते हैं कि धर्म के सारतत्व वृद्धि पर ध्यान देना चाहिए और इसका मूल है "वाणी संयम"। लोगो को मौके- बेमौके अपने सम्प्रदाय की प्रशंसा व दूसरे के सम्प्रदाय की निंदा नहीं करनी चाहिए। इसके विपरीत एक न एक कारण से अन्य धर्मों का आदर करना चाहिए और ऐसा करके व्यक्ति अपने सम्प्रदाय की वृद्धि तो करता ही है साथ ही दूसरे सम्प्रदाय का उपकार। जबकि इसके विपरीत आचरण अपने धर्म को हानि पहुँचाता है और साथ ही दूसरे सम्प्रदाय का अपकार भी।जो को अपने सम्प्रदाय के उन्नति की लालसा से दूसरे धर्म की निन्दा करता है वह वस्तुतः अपने धर्म की ही बहुत बड़ी हानि करता है। इसलिए लोग एक-दूसरे के धम्म को सुने , इससे सभी सम्प्रदाय बहुश्रुत होंगे और संसार का कल्याण होगा।
इसी तरह गुप्तकाल में समाज, धर्म, संस्कृति, राजनीति, कला आदि में एक छोर से दूसरे छोर तक समन्वय, मेलजोल व सहिष्णुता दिखायी देती है।
मुगल शासन के दौरान विशेषकर सम्राट अकबर ने "सुलह-ए-कुल" के माध्यम से सम्पूर्ण देश को एक सूत्र में बाँधने का अद्भुत प्रयास किया। अकबरकालीन वास्तुकला को देखने से सहज ही अनुमान लग जाता है कि वह हिन्दू, बौद्ध, फारसी, तुर्की इत्यादि सभी परम्पराओं को अपनाने को व उनके समामेलन को तैयार रहता था।
इन विराट समन्वयात्मक प्रयासों को बीच-बीच में झटके भी लगे पर वे भारतीय मूल आत्मा (सहिष्णुता व सहनशीलता) को कोई विशेष व स्थाई हानि नहीं पहुँचा पाये।
जैसे मौर्य-काल के बाद पुरोहितों ने "वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति" तो अकबर के समय "इस्लाम खतरे में है" का नारा बुलंद किया गया।
और तो और महात्मा गाँधी की हत्या उन्मादी गोडसे द्वारा किया जाना ...हिन्दू धर्म पर आसन्न संकट को टालने के लिए कर दिया जाना ...भी हमारी सहिष्णुता की चूलें नहीं हिला पाया...
भारत सहिष्णु है और सहिष्णु रहेगा ...छिटपुट घटनाओं को छोड़ दें तो भारत एक शान्तिप्रिय देश है...यहाँ पर संसार के सभी धर्मावलंबी एक साथ रहते हैं, सभी नस्ल के लोग साथ रहते हैं...गोरे हो या काले , नाक चपटी हो या तोते जैसी, ठिगने हो या लम्बे...सब साथ -साथ रहते हैं।
किसी भी देश में जब दूसरा धर्म आता है तो पूर्व धर्म का मूलोच्छेदन हो जाता है ...ईरान में जब इस्लाम आया तो वहाँ से पारसी धर्म खत्म हो गया...भारत में आज जो भी पारसी समुदाय है वह ईरान से आये हुए शरणार्थी लोग हैं।
भारत में ईसाई धर्म प्रथम शदाब्दी में ही आ गया था। भारतीय शासकों ने सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता की नीति अपनाई चाहे वो हिन्दू शासक हो या मुस्लिम।
वर्तमान में सहिष्णुता व असहिष्णुता पर जो बहस चल रही है उसे हमें विश्व के अन्य देशों से तुलना करके पता चल जायेगा कि कितनी सच्चाई है ?
पहले आस्ट्रेलिया से शुरू करते हैं, अंग्रेजों ने जब यहाँ बसने का निर्णय ले लिए तो उन्होंने एक तरफ से यहाँ के मूल वासिन्दों का संहार कर डाला और बहुसंख्यक बन बैठे ।...इसी तरह USA में गोरों ने वहाँ के आदिवासियों, रेड-इंडियनों के सफाये में कोई कसर नहीं छोड़ी...न्यूजीलैंड में भी यही किया गया...दक्षिण अफ्रीका की नस्ल-भेद(Apartheid) नीति १९९० के बाद नेल्सन मंडेला के राष्ट्रपति बनने के बाद ही खतम हो सकी...तथाकथित विकसित देशों से नस्लीय भेदभाव व धार्मिक असहिष्णुता के समाचार आते रहते हैं।
इजराइल-फिलिस्तीन का संघर्ष हो या खाड़ी देशों में धार्मिक उन्माद, सीरिया समस्या हो या उसी क्षेत्र में शिया-सुन्नी विवाद ...सब के सब हिंसा के सहारे दुसरे धर्म व नस्ल का विनाश करने पर तुले हुए हैं।
आजादी के समय पाकिस्तान में लगभग १५% हिन्दू थे जो अब ५% से भी कम रह गये हैं। बात बिलकुल आइने की तरह स्पष्ट है।
भारत की स्थिति बिल्कुल अलग है, यहाँ की मिट्टी व जलवायु में ही कुछ ऐसा है कि ...intolerant Islam यहाँ आकर Tolerant हो जाता है वह सुलह कुल की बात करने लगता है और सूफी वाद से प्रभावित होता है।
मैं दावे के साथ सीना ठोंककर कहता हूँ कि भारतीय मुसलमान दुनिया के अन्य मुसलमानों से अलग है, वह खाड़ी देशों के मुसलमानों व पाकिस्तानियों की तरह हिंसक नहीं है, वह सह-अस्तित्व में विश्वास करता है।
एक बात जो मैने अनुभव की है वह ये कि ...असहिष्णुता की सारी चोंचलेबाजी भारतीय शहरी मध्यम वर्ग व राजनीतिज्ञों की देन है।
भारत तो गाँव में बसता है और गाँव सम्पूर्ण रूप से सहिष्णु है, सह-अस्तित्व में विश्वास करता है ...बेशक गाँवों में बहुत समस्याएं हैं, गरीबी, अल्पविकास, अंधविश्वास ...फिरभी गाँव असहिष्णु बिल्कुल भी नहीं है।
शहरों में भी कुछ ज्यादा विचारवान लोग हिन्दू /इस्लाम खतरे में है का नारा उछाल दिया करते हैं और अपना स्वार्थ-साधन करते हैं।
मेरा अनुरोध है कि ...ये खतरे वाला नारा जो भी लगाये ...उसे तुरन्त Unfriend कीजिए ...ये विषाणु हैं, या यू कहें कि अछूत बीमारी है ये...ये भारत के दुश्मन हैं ...इनसे दूर रहना है हमें ...
भारत हम सबका है, धर्म का मामला व्यक्तिगत है, लोकहित व देशहित सर्वोपरि है , धर्म इसके आड़े नहीं आना चाहिए।
"धर्म की सार्थकता समाज को जोड़ने में है न कि उसे तोड़ने में "। ...यदि धर्म समाजिक विद्वेष फैलाने लगे तो वो अपनी सार्थकता खो देता है और ऐसा धर्म पराभव की तरफ बढ़ने लगता है, इसीलिए उसमें समयानुकूल परिवर्धन व परिष्कार की जरुरत होती है।
भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा है -
"सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुखभाग भवेत्।।"
अर्थात् धर्म है
"परहित सरिस धर्म नहिं भाई।
परपीड़ा सम नहिं अधमाई।।"
परन्तु धर्म का अर्थ ही हम कुछ और लगा बैठे हैं। धर्म के नाम पर एक दूसरे की हत्या अस्वीकार्य है। ये धर्म नहीं अधर्म है।
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भारत हम सबका है, धर्म का मामला व्यक्तिगत है, लोकहित व देशहित सर्वोपरि है , धर्म इसके आड़े नहीं आना चाहिए।
"धर्म की सार्थकता समाज को जोड़ने में है न कि उसे तोड़ने में "। ...
... धर्म है-
"परहित सरिस धर्म नहिं भाई।
परपीड़ा सम नहिं अधमाई।।"
परन्तु धर्म का अर्थ ही हम कुछ और लगा बैठे हैं। धर्म के नाम पर एक दूसरे की हत्या अस्वीकार्य है। ये धर्म नहीं अधर्म है।
भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा है -
"सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुखभाग भवेत्।।"
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सहिष्णुता का अर्थ है- सहनशीलता , अर्थात् ऐसे विचारों के प्रति भी सहनशील होना जिससे असहमति हो । इसके अलावा दर्द को बर्दाश्त करना, विषम परिस्थितियों में धैर्यवान रहना भी सहिष्णुता है। परन्तु सहिष्णुता व असहिष्णुता का प्रयोग अब अधिकतर विचारों व धर्मों के प्रति सहमति व असहमति से लगाया जाता है। इस संदर्भ में धार्मिक सहिष्णुता/असहिष्णुता (religious tolerance/intolerance), नस्लीय सहिष्णुता /असहिष्णुता( racial tolerance/intolerance) जैसे शब्द अक्सर सुनने में आते हैं।
हाल में ही अभिनेता आमिर खान के बयान ने हंगामा बरपा दिया , उनके बयान में यह झलक रहा है कि भारत का माहौल दिनों -दिन खराब होता जा रहा है और लोग धार्मिक रूप से सहनशील कम होते जा रहे हैं।
सहिष्णुता - असहिष्णुता के मुद्दे को लेकर संसद से लेकर सड़कों तक बहस जारी है।
मूल प्रश्न यह है कि, क्या सचमुच हम(भारतीय) असहिष्णु होते जा रहे हैं ?
इसे समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा और साथ ही विश्व के अन्यान्य देशों पर भी दृष्टिपात कर लेना चाहिए। फिर तस्वीर साफ होगी कि क्या सचमुच हम असहिष्णु होते जा रहे हैं या फिर ऐसे आरोप सच से परे हैं।
पहले हम अतीत में लौटते हैं। हमारे देश में लोकनायक वही हो सकता है जिसमें समन्वय की अपार क्षमता हो। महात्मा बुद्ध हो , सम्राट अशोक हो ,बादशाह अकबर हो या फिर महात्मा गाँधी । साहित्य के क्षेत्र में गोस्वामी तुलसीदास ने समन्वय का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया है।
हमारा भक्ति आन्दोलन और सूफी आन्दोलन भी इसी का उदाहरण है। जिसने भी मलिक मुहम्मद जायसी के पद्मावत को पढ़ा होगा उसे ये ज्ञात होगा कि एक सूफी कवि फारसी के स्थान पर अवधी भाषा में काव्य रचना करता है और वह हिन्दू देवी देवताओं का गुणगान करते हैं। जायसी की सहानुभूति अलाउद्दीन खिलजी के साथ नहीं बल्कि राणा रत्नसेन के साथ है।
दो सहस्राब्दी पूर्व सम्राट अशोक ने अपने शिला प्रज्ञापनों में धार्मिक-सहिष्णुता के सम्बन्ध में जो बातें लिखवायी थी वो आज भी प्रासंगिक व सम्पूर्ण संसार के लिए दिशाबोधक हैं। ...वो कहते हैं कि धर्म के सारतत्व वृद्धि पर ध्यान देना चाहिए और इसका मूल है "वाणी संयम"। लोगो को मौके- बेमौके अपने सम्प्रदाय की प्रशंसा व दूसरे के सम्प्रदाय की निंदा नहीं करनी चाहिए। इसके विपरीत एक न एक कारण से अन्य धर्मों का आदर करना चाहिए और ऐसा करके व्यक्ति अपने सम्प्रदाय की वृद्धि तो करता ही है साथ ही दूसरे सम्प्रदाय का उपकार। जबकि इसके विपरीत आचरण अपने धर्म को हानि पहुँचाता है और साथ ही दूसरे सम्प्रदाय का अपकार भी।जो को अपने सम्प्रदाय के उन्नति की लालसा से दूसरे धर्म की निन्दा करता है वह वस्तुतः अपने धर्म की ही बहुत बड़ी हानि करता है। इसलिए लोग एक-दूसरे के धम्म को सुने , इससे सभी सम्प्रदाय बहुश्रुत होंगे और संसार का कल्याण होगा।
इसी तरह गुप्तकाल में समाज, धर्म, संस्कृति, राजनीति, कला आदि में एक छोर से दूसरे छोर तक समन्वय, मेलजोल व सहिष्णुता दिखायी देती है।
मुगल शासन के दौरान विशेषकर सम्राट अकबर ने "सुलह-ए-कुल" के माध्यम से सम्पूर्ण देश को एक सूत्र में बाँधने का अद्भुत प्रयास किया। अकबरकालीन वास्तुकला को देखने से सहज ही अनुमान लग जाता है कि वह हिन्दू, बौद्ध, फारसी, तुर्की इत्यादि सभी परम्पराओं को अपनाने को व उनके समामेलन को तैयार रहता था।
इन विराट समन्वयात्मक प्रयासों को बीच-बीच में झटके भी लगे पर वे भारतीय मूल आत्मा (सहिष्णुता व सहनशीलता) को कोई विशेष व स्थाई हानि नहीं पहुँचा पाये।
जैसे मौर्य-काल के बाद पुरोहितों ने "वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति" तो अकबर के समय "इस्लाम खतरे में है" का नारा बुलंद किया गया।
और तो और महात्मा गाँधी की हत्या उन्मादी गोडसे द्वारा किया जाना ...हिन्दू धर्म पर आसन्न संकट को टालने के लिए कर दिया जाना ...भी हमारी सहिष्णुता की चूलें नहीं हिला पाया...
भारत सहिष्णु है और सहिष्णु रहेगा ...छिटपुट घटनाओं को छोड़ दें तो भारत एक शान्तिप्रिय देश है...यहाँ पर संसार के सभी धर्मावलंबी एक साथ रहते हैं, सभी नस्ल के लोग साथ रहते हैं...गोरे हो या काले , नाक चपटी हो या तोते जैसी, ठिगने हो या लम्बे...सब साथ -साथ रहते हैं।
किसी भी देश में जब दूसरा धर्म आता है तो पूर्व धर्म का मूलोच्छेदन हो जाता है ...ईरान में जब इस्लाम आया तो वहाँ से पारसी धर्म खत्म हो गया...भारत में आज जो भी पारसी समुदाय है वह ईरान से आये हुए शरणार्थी लोग हैं।
भारत में ईसाई धर्म प्रथम शदाब्दी में ही आ गया था। भारतीय शासकों ने सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता की नीति अपनाई चाहे वो हिन्दू शासक हो या मुस्लिम।
वर्तमान में सहिष्णुता व असहिष्णुता पर जो बहस चल रही है उसे हमें विश्व के अन्य देशों से तुलना करके पता चल जायेगा कि कितनी सच्चाई है ?
पहले आस्ट्रेलिया से शुरू करते हैं, अंग्रेजों ने जब यहाँ बसने का निर्णय ले लिए तो उन्होंने एक तरफ से यहाँ के मूल वासिन्दों का संहार कर डाला और बहुसंख्यक बन बैठे ।...इसी तरह USA में गोरों ने वहाँ के आदिवासियों, रेड-इंडियनों के सफाये में कोई कसर नहीं छोड़ी...न्यूजीलैंड में भी यही किया गया...दक्षिण अफ्रीका की नस्ल-भेद(Apartheid) नीति १९९० के बाद नेल्सन मंडेला के राष्ट्रपति बनने के बाद ही खतम हो सकी...तथाकथित विकसित देशों से नस्लीय भेदभाव व धार्मिक असहिष्णुता के समाचार आते रहते हैं।
इजराइल-फिलिस्तीन का संघर्ष हो या खाड़ी देशों में धार्मिक उन्माद, सीरिया समस्या हो या उसी क्षेत्र में शिया-सुन्नी विवाद ...सब के सब हिंसा के सहारे दुसरे धर्म व नस्ल का विनाश करने पर तुले हुए हैं।
आजादी के समय पाकिस्तान में लगभग १५% हिन्दू थे जो अब ५% से भी कम रह गये हैं। बात बिलकुल आइने की तरह स्पष्ट है।
भारत की स्थिति बिल्कुल अलग है, यहाँ की मिट्टी व जलवायु में ही कुछ ऐसा है कि ...intolerant Islam यहाँ आकर Tolerant हो जाता है वह सुलह कुल की बात करने लगता है और सूफी वाद से प्रभावित होता है।
मैं दावे के साथ सीना ठोंककर कहता हूँ कि भारतीय मुसलमान दुनिया के अन्य मुसलमानों से अलग है, वह खाड़ी देशों के मुसलमानों व पाकिस्तानियों की तरह हिंसक नहीं है, वह सह-अस्तित्व में विश्वास करता है।
एक बात जो मैने अनुभव की है वह ये कि ...असहिष्णुता की सारी चोंचलेबाजी भारतीय शहरी मध्यम वर्ग व राजनीतिज्ञों की देन है।
भारत तो गाँव में बसता है और गाँव सम्पूर्ण रूप से सहिष्णु है, सह-अस्तित्व में विश्वास करता है ...बेशक गाँवों में बहुत समस्याएं हैं, गरीबी, अल्पविकास, अंधविश्वास ...फिरभी गाँव असहिष्णु बिल्कुल भी नहीं है।
शहरों में भी कुछ ज्यादा विचारवान लोग हिन्दू /इस्लाम खतरे में है का नारा उछाल दिया करते हैं और अपना स्वार्थ-साधन करते हैं।
मेरा अनुरोध है कि ...ये खतरे वाला नारा जो भी लगाये ...उसे तुरन्त Unfriend कीजिए ...ये विषाणु हैं, या यू कहें कि अछूत बीमारी है ये...ये भारत के दुश्मन हैं ...इनसे दूर रहना है हमें ...
भारत हम सबका है, धर्म का मामला व्यक्तिगत है, लोकहित व देशहित सर्वोपरि है , धर्म इसके आड़े नहीं आना चाहिए।
"धर्म की सार्थकता समाज को जोड़ने में है न कि उसे तोड़ने में "। ...यदि धर्म समाजिक विद्वेष फैलाने लगे तो वो अपनी सार्थकता खो देता है और ऐसा धर्म पराभव की तरफ बढ़ने लगता है, इसीलिए उसमें समयानुकूल परिवर्धन व परिष्कार की जरुरत होती है।
भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा है -
"सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुखभाग भवेत्।।"
अर्थात् धर्म है
"परहित सरिस धर्म नहिं भाई।
परपीड़ा सम नहिं अधमाई।।"
परन्तु धर्म का अर्थ ही हम कुछ और लगा बैठे हैं। धर्म के नाम पर एक दूसरे की हत्या अस्वीकार्य है। ये धर्म नहीं अधर्म है।
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