मंगलवार, 12 जनवरी 2016

नारी और रजोधर्म पर पवित्रता व अपवित्रता विवाद

मंदिर में देवीरूप की पूजा,
और उसी नारी का मंदिर-प्रवेश-निषेध !!!
संदर्भ -सबरीमाला मंदिर पर माननीय उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी
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सबरीमाला मंदिर केरल में पश्चिमी घाट के पेरियार के समीप स्थित है। यहाँ पर प्रति वर्ष लगभग १० करोड़ तीर्थयात्री दर्शनार्थ आते हैं, जोकि संख्याबल के आधार पर विश्व में स्थान रखता है।
इस मंदिर में पुरुषों के प्रवेश पर कोई रोक नहीं है। लेकिन महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया जाता है। सामान्यतः १० से ५० वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं का प्रवेश निषिद्ध किया गया है। और इसका कारण ये दिया गया है कि इस आयु वर्ग की स्त्रियों को रजोधर्म आता है और वे अपवित्र रहती हैं और इसका आधार लिया जाता है कि मंदिर के देवता "अयप्पा" अविवाहित / ब्रह्मचारी थे।
इस भेदभाव के विरुद्ध "युवा अधिवक्ता संघ" विगत १० वर्षों से मंदिर का प्रबंधन देखने वाली संस्था"ट्रावनकोर देवासम् बोर्ड" से न्यायिक लड़ाई लड़ रहा है।
माननीय उच्चतम् न्यायालय के न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति एनवी रमण की पीठ ने कहा, 'मंदिर धर्म के आधार के अलावा प्रवेश (महिलाओं का) वर्जित नहीं कर सकता। जब तब आपको संवैधानिक अधिकार प्राप्त न हो, आप प्रवेश वर्जित नहीं कर सकते।' {The temple cannot prohit the entry (women), except on the basis of religion . Unless you have a constitutional right, you cannot prohit entry}
न्यायालय ने टिप्पणी की कि इस परंपरा को किसी संवैधानिक व्यवस्था का समर्थन प्राप्त नहीं है।
न्यायालय ने सरकार से जानना चाहा कि क्या यह सही है कि पिछले 1500 साल से महिलाओं को मंदिर परिसर में प्रवेश की अनुमति नहीं है। पीठ ने टिप्पणी की कि यह सार्वजनिक मंदिर है और हर व्यक्ति को इसमें जाने का अधिकार होना चाहिए। अधिक से अधिक वहां धार्मिक प्रतिबंध हो सकता है, लेकिन सामान्य प्रतिबंध नहीं।
 माननीय उच्चतम् न्यायलय ने इसी तरह के एक मामले में,  "श्री मीनाक्षी अम्मान मंदिर " मदुरई ,तमिलनाडु के संबंध में निर्णय सुनाया था कि, "संवैधानिक वैधता अनिवार्य रूप से सभी प्रकार के धार्मिक विश्वास या प्रथा/व्यवहार पर अभिभावी होगी।"{ Constitutional legitimacy must supersede all religious beliefs or practices.} इसी निर्णय में न्यायलय ने कहा था कि मंदिर का पुजारी अब्राह्मण भी हो सकता है। अर्थात् अब मंदिर पर ब्राह्मणों की इजारेदारी नहीं चलेगी।
माननीय न्यायलय लैंगिक भेदभावपूर्ण रवैये पर अगली सुनवाई फरवरी में करेगा,  पर उसकी टिप्पणियाँ स्वागत योग्य हैं।
एक स्त्री रजोधर्म के दौरान अपवित्र क्यों ?
इस पर मुझे सिर्फ इतना कहना है कि जो मानसिक दीवालिये नारी को अपवित्र मानते हैं वो स्वयं अपवित्र हैं, उनकी सोच गंदी है।
नारी ही सृजनशक्ति है उसी से जीवन की शुरुआत है। उसी के शरीर में जीवन ढलता है। जिसे ये गंदी सोच वाले अपवित्रता कहते हैं वहीं से जीवन की शुरुआत होती है।
जिसे समझना होगा वो एक फूल को देखकर समझ सकता है,क्योंकि एक फूल को ध्यान से बैठकर कुछ समय तक निहारने पर प्रकृति के सारे रहस्य हृदयंगम् हो जायेंगे। और जिसे नहीं समझना उसे ब्रह्मा भी नहीं समझा सकते ठीक उसी तरह- जैसे, चाहे जितनी अच्छी बारिश हो बेंत में फूल व फल नहीं लगते।
स्त्री सम्माननीय हैं और शक्ति-स्वरूपा हैं। ये तो हम केवल नवरात्रि में प्रदर्शित करते हैं पर क्या व्यवहार में ऐसा कर पाये ?
"क्या जरूरत ऐसे सिद्धांत की,
कि 'यत्र नार्यस्तु पुज्यंते रमंते तत्र देवता' ;
और वही घोषित -"स्त्री न स्वातंत्र्यमर्हति" !
लड़ाई तुम्हारी है लड़ना तुम्हें ही पड़ेगा
मंदिर में देवीरूप की पूजा,
और उसी नारी का मंदिर-प्रवेश-निषेध !!!
जिससे बना शरीर हमारा,
वही अपवित्र हो गयी,
और हम पवित्र  ?
यह कैसा दोगलापन ,
सिद्धांत कुछ और पर व्यवहार कुछ और,
हमेशा नारी शोषण को आतुर पुरुष,
घर व बाहर !
अस्तित्व का एहसास निहायत जरुरी है !
हर रूप और कौशल का प्रदर्शन जरुरी है !
स्व-अस्तित्व के सबूत, तुम्हें खुद प्रस्तुत करना होगा !
अधिकार की मांग और अस्मिता के गान खुद बुलंद करना होगा !
पुरुषों ने आखिर तुम्हें कब कुछ दिया है -दुत्कार और धिक्कार के सिवा ?
हाँ संभालना तुम्हारा व्यवहार रहा है !
पर कब तक ???
और जो भी इस लक्ष्मण रेखा को पार करने की हिमाकत करे !
उसके लिए तुम माफ़ी शब्द भूल जाओ!
उसे भय और खौफ के खम्भों से बांध कर !
बलि-देवी का बुलावा दे दो !
लड़ाई तुम्हारी है और लड़ना भी तुम्हीं को पड़ेगा !
क्योंकि;
विकर्ण सभा से निकाल दिये जाते हैं,
किसन भी मदद को अब नहीं आते हैं !
निर्भीक निडर और निर्विकार हो स्वीकार करो ,हे नारी !!!"
रजोधर्म की जानकारी हेतु लिंक
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http://www.jsk.gov.in/hindi/puberty.asp
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