सोमवार, 11 जनवरी 2016

रुपहला पर्दा और दलित अस्मिता


"आज दमित-शोषित वर्ग में भी दशरथ माँझी सरीखे संघर्षरत लोगों की कमी नहीं है। परन्तु वे रुपहले पर्दे का कथ्य नहीं बन पाते हैं।... हमारे धर्म-ग्रंथ जो गरीब के रूप में यही कहानी लिखते रहे हैं कि ...एक गरीब ब्राह्मण था ...नायक हमेशा एक सम्भ्रांत कुलीन राजकुमार ही होता था ...की मानसिकता से हमारा सिनेमाई संसार आज भी नहीं निकल पा रहा है ...उसकी दृष्टि में बाजीराव सिंघम व चुलबुल पाण्डेय पर जाकर अटक जाती है ...हिंदी फिल्मों में देवी-देवता होते हैं ...नारी  सबला नहीं अबला दिखाई जाती है और हीरो आकर उसकी इज्जत बचाकर उसके दिल को जीत लेता है ...मंदिर में घंटे बजाकर अथवा मस्जिद में नमाज पढ़कर समस्याओं का समाधान मांगा जाता है ...ये है हमारी फिल्मों का कथ्य ...ग्रामीण परिवेश गायब ...सारे के सारे कैनवास जो फिल्मों में बुने जाते हैं  हवाहवाई होते हैं ...वास्तविकता से कोसों दूर ...केवल और केवल व्यावसायिकता ...।"
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भारत में फिल्में मात्र मनोरंजन का साधन ही नहीं हैं  बल्कि समाज का आईना भी हैं और समाज को सोचने पर विवश भी करती हैं। फिल्मों में दलित व दलित-स्त्री समस्याएं भी उठाये गये हैं। आप लोगों ने भी देखें होंगे । इस दृष्टिकोण से आइये कुछ फिल्मों को चुनकर इस समस्या पर मंथन करें जिनमें इस पर प्रमुखता से विचार किया गया है।
(क)-औपनिवेशिक काल की फिल्में
       १-खुदा की बात; १९३० -आर०एस०चौधरी
       २-चंडीदास; १९३४-नितिन बोस
       ३-धर्मात्मा; १९३५-वी०शान्ताराम
       ४-अछूत कन्या; १९३६-फ्रेट्स आस्टन
       ५-अछूत; १९४०-चन्दूलाल शाह ।
(ख)-स्वातंत्र्योत्तर काल की फिल्में
       १-सद्गति; १९८१-सत्यजित राय(प्रेमचंद की कहानी)
       २-दीक्षा; १९९१- अरुण कौल
       ३-समर; १९९९-श्याम बेनेगल
       ४-सुजाता; १९७९-विमल राय
       ५-दो बीघा जमीन-विमल राय
       ६-पार -गौतम घोष
       ७-दामुल; १९८५ -प्रकाश झा
       ८-आक्रोश
       ९-समय
       १०-लगान
       ११-आरक्षण
       १२-मांझी द माउंटेन मैन ।
बोलती फिल्मों के निर्माण की शुरुआत (१९३१) तक राष्ट्रवाद और दलित-विमर्श की दिशाएँ विपरीत हो चुकी थीं। अधिकांश साहित्यकार, चित्रकार और रंगकर्मी शहरी व उच्चवर्गीय थे ।उनके राजनीतिक सरोकार दलित समस्याओं से न के बराबर थे । हिन्दी सिनेमा भी इस आग्रह से बच न सका । उस समय (औपनिवेशिक काल) अधिकांश फिल्में बंम्बई या कलकत्ता में बनती थीं ।
फिल्म "अछूत कन्या" में एक दलित लड़की 'कस्तूरी' एक ब्राह्मण युवक 'प्रताप' परस्पर  प्यार करते हैं परन्तु हिन्दू समाज को यह अस्वीकार्य है। कस्तूरी का विवाह उसके ही दलित परिवार में हो जाता है। एक दिन अचानक कस्तूरी और प्रताप की मुलाकात मेले में हो जाती है। कस्तूरी के पति को यह मुलाकात पूर्व-नियोजित लगती है और वह प्रताप से लड़ बैठता है। दोनों लड़ते-२ रेलवे क्रासिंग पर आ जाते हैं। रेल आने वाली है। कस्तूरी उन्हें बचाने के चक्कर में खुद रेल के पहिए के नीचे आ जाती है। "इस तरह एक अछूत लड़की अपने जीवन का बलिदान कर देती है ताकि समाज के सवर्ण व अवर्ण शांति से रह सकें।" वैसे इस फिल्म में अस्पृश्यता का मुद्दा अछूता ही रह गया है।
फिल्म "अछूत" गाँव के कुएँ से पानी पीने , मंदिर में दलित प्रवेश के मुद्दे और बाध्य होकर धर्म परिवर्तन के मुद्दे को उठाती है। अंतत: मंदिर प्रवेश व पानी पीने में कुएँ का उपयोग जैसे पेचीदा मुद्दे का समाधान गाँधीवादी तरीके से किया गया है जो कि वायकोम सत्याग्रह (१९२७) की प्रतिध्वनि है।
फिल्म  "सद्गति" में घासीराम-ब्राह्मण, दुखी-अछूत और मनुरिया (दुखी की पत्नी) प्रमुख पात्र हैं। बीमार दुखिया का लकड़ी चीरना , घासीराम की संवेदनहीनता और धार्मिक आडंबर और अंत में लकड़ी चीरते -चीरते दुखी की मृत्यु, फिल्म तो नहीं लेकिन जिन्होंने मूल रूप से प्रेमचंद की पढ़ी है अंदर तक हिल जाते हैं।
फिल्म "दीक्षा" भी सद्गति की तरह ही ब्राह्मणों के कर्मकांडों पर प्रश्न उठाती है, लेकिन जातिव्यवस्था से मुक्ति का समाधान नहीं प्रस्तुत करती है।
फिल्म "समर" म०प्र० के एक गाँव की सच्ची घटना(९०का दशक) पर आधारित है। कुल्ल गाँव में जिसमें दलित अधिक थे , एक हैंडपंप लगाया गया , जिसका विरोध राजपूत जाति के सरपंच व उसके गुर्गों द्वारा किया गया। कुल्ल गाँव में दलित उत्पीड़न का इतिहास काफी पुराना है। बात बात पर पिटाई, कोड़े लगाना, यातनाएँ देना व अपमानित करना आम बात थी। ...लेकिन अन्य फिल्मों की तरह ही समर भी दलितों के प्रति शहरी, सवर्ण समाज की दया-दृष्टि का प्रतीक बनकर रह गयी है।
फिल्म  "सुजाता" एक अछूत लड़की की कहानी है। यद्यपि फिल्म में दलित युवती को सहानुभूतिपूर्वक दिखाया गया है और गाँधी की प्रतिमा भी सुजाता के दुख से रो पड़ती है।  गाँधी जी द्वारा अपने सवर्ण अनुयायियों के विरोध के बावजूद अछूत लक्ष्मी को शरण देने का प्रसंग भी आता है। तथापि यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि दलित आंदोलन के मुखर नेता ज्योतिबा फूले व डॅा० अम्बेडकर का जिक्र तक नहीं इस फिल्म में। यह एक तरह से अछूत के प्रति सवर्णवादी समाज के दयावादी सोच है न की उनके अधिकारों का ही प्रतिबिंब है। दलित नायिका जन्मजात दलित-जाति में जन्म के कारण हीन भावना से ग्रसित दिखती है और उसके मन में अपने समाज से भेदभाव के प्रति आक्रोश नदारद है । वह दलित अस्मिता से शून्य है । यहाँ भी गाँधीवादी सोच हावी है । यह उल्लेखनीय है कि दलित विमर्श स्वाभिमान व अधिकारों की बात करता है (ज्योतिबा फूले व डॅा० अम्बेडकर) न कि सवर्णों की दयादृष्टि से कुछेक सुविधा की।
फिल्म  "पार" में दलित शोषण-दमन को ईमानदारी से दिखाने का प्रयास किया गया है । दलित वर्ग लाचार व निरुपाय होकर दमन व शोषण से बचने के लिए एक सुनहरे स्वप्न को साकार करने के लिए शहर का रुख करता है परन्तु वहाँ भी उसे निराशा हाथ लगती है। सुअरों को नदी पार कराते समय स्मिता पाटिल का गर्भपात हो जाता है - अर्थात् इस जीवन में तो कुछ मिला नहीं उलटे पाने की लालसा में भावी पीढ़ी भी नष्ट हो गयी। दलित जीवन के पास कुछ न होने से शुरू होकर कुछ पाने की कोशिश में सब कुछ गंवाने का की लहूलुहान यात्रा का दस्तावेज है फिल्म "पार"।
फिल्म  "दामुल" में एक प्रमुख मुद्दा उठाया गया जिसमें दलित-वर्ग को गाँव छोड़कर शहरों की ओर पलायन को रोक दिया जाता है लाठी के बल पर।
फिल्म  "समर" ९० के दशक की एक सच्ची घटना पर आधारित है।  कहते हैं कि मंदिर में प्रवेश की सजा के नाम पर ठाकुर ने एक दलित के सर पर भरी पंचायत में पेशाब कर दिया था ।
यदि हम फिल्मों में दर्शाये गये दलित-शोषित वर्ग पर एक सरसरी निगाह डालें तो एक बात स्पष्ट हो जायेगी। दलित वर्ग को फिल्मों में सतही तौर पर ही छूने का प्रयास किया गया है। "लगान" फिल्म के एक पात्र "कचरा" से यह बात स्पष्ट हो जाती है । क्या मजाक बनाया गया है दलितों का ? एक हाथ मुड़ा हुआ तथाकथित हीरो भुवन की रहमोकरम पर निर्भर है वह । इससे विदेशों में (क्योंकि यह आस्कर) के लिए गयी थी, भ्रम हो सकता है कि वास्तविक जीवन में दलित ऐसे होते हैं। भुवन , फिल्म का नायक एक द्विज है, क्या वह शूद्र नहीं हो सकता ? अथवा कचरा द्विज क्यों नहीं हो सकता ? ...फिल्मों में ज्यादातर दलित पात्रों को या तो नकारात्मक दिखाया जाता है अथवा निरीह । " दबंग" पिक्चर का हीरो एक पाण्डेय है न कि कोई दलित।  ...वास्तविक जीवन में संघर्ष करता दलित फिल्मी लेखकों को दिखाई ही नहीं देता है। ...या यों भी कह सकते हैं उनकी व्यवसायिक मजबूरियां हैं क्योंकि  "मांझी द माउंटेन मैन" उतना नहीं कमा पाती जितना कि "बजरंगी भाईजान" जैसी दो कौड़ी की काल्पनिक फिल्में ।
फिल्म "आरक्षण" अपने नाम के प्रतिकूल शिक्षा के व्यावसायीकरण पर केंद्रित है और दलित समस्या को व सवर्ण के बीच एक संतुलन साधती है , परन्तु सतही रूप से ।
"हंस" पत्रिका को दिये गये इंटरव्यू में हेमामालिनी ने बताया कि धर्मेंद्र ने उनकी तारीफ में कहा था "You have Aryan features" अर्थात् तुम्हारे नैन-नक्श आर्यों जैसे हैं। अभिनेता धर्मेंद्र का यह कथन हमारी फिल्मी दुनिया के जातीय विश्लेषण प्रस्तुत करता है। भारतीय राजनीति और न्यायपालिका की तरह फील्मी दुनिया में भी कुछ जाति-परिवारों का वर्चस्व है। इसमें दलितों का "प्रवेश-निषेध" अघोषित रूप से पालन होता आ रहा है। हालांकि एकाध दलित (शैलेंद्र) पहुँच भी जाते हैं तो व्यावसायिक मजबूरियां उन्हें विवश कर देती हैं और वे दलित जीवन को नहीं उकेर पाते हैं।
आज दमित-शोषित वर्ग में भी दशरथ माँझी सरीखे संघर्षरत लोगों की कमी नहीं है। परन्तु वे रुपहले पर्दे का कथ्य नहीं बन पाते हैं।... हमारे धर्म-ग्रंथ जो गरीब के रूप में यही कहानी लिखते रहे हैं कि ...एक गरीब ब्राह्मण था ...नायक हमेशा एक सम्भ्रांत कुलीन राजकुमार ही होता था ...की मानसिकता से हमारा सिनेमाई संसार आज भी नहीं निकल पा रहा है ...उसकी दृष्टि में बाजीराव सिंघम व चुलबुल पाण्डेय पर जाकर अटक जाती है ...हिंदी फिल्मों में देवी-देवता होते हैं ...नारी  सबला नहीं अबला दिखाई जाती है और हीरो आकर उसकी इज्जत बचाकर उसके दिल को जीत लेता है ...मंदिर में घंटे बजाकर अथवा मस्जिद में नमाज पढ़कर समस्याओं का समाधान मांगा जाता है ...ये है हमारी फिल्मों का कथ्य ...ग्रामीण परिवेश गायब ...सारे के सारे कैनवास जो फिल्मों में बुने जाते हैं  हवाहवाई होते हैं ...वास्तविकता से कोसों दूर ...केवल और केवल व्यावसायिकता ...।

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