बुधवार, 13 जनवरी 2016

सहिष्णुता बनाम असहिष्णुता

••• सहिष्णुता बनाम असहिष्णुता •••
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भारत हम सबका है, धर्म का मामला व्यक्तिगत है, लोकहित व देशहित सर्वोपरि है  , धर्म इसके आड़े नहीं आना चाहिए।
"धर्म की सार्थकता समाज को जोड़ने में है न कि उसे तोड़ने में "। ...
... धर्म है-
"परहित सरिस धर्म नहिं भाई।
परपीड़ा सम नहिं अधमाई।।"
परन्तु धर्म का अर्थ ही हम कुछ और लगा बैठे हैं। धर्म के नाम पर एक दूसरे की हत्या अस्वीकार्य है। ये धर्म नहीं अधर्म है।
भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा है -
"सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुखभाग भवेत्।।"

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सहिष्णुता का अर्थ है-  सहनशीलता , अर्थात् ऐसे विचारों  के प्रति भी सहनशील होना जिससे असहमति हो । इसके अलावा दर्द को बर्दाश्त करना, विषम परिस्थितियों में धैर्यवान रहना भी सहिष्णुता है। परन्तु सहिष्णुता व असहिष्णुता का प्रयोग अब अधिकतर विचारों व धर्मों के प्रति सहमति व असहमति से लगाया जाता है। इस संदर्भ में धार्मिक सहिष्णुता/असहिष्णुता (religious tolerance/intolerance), नस्लीय सहिष्णुता /असहिष्णुता( racial tolerance/intolerance) जैसे शब्द अक्सर सुनने में आते हैं।
हाल में ही अभिनेता आमिर खान के बयान ने हंगामा बरपा दिया , उनके बयान में यह झलक रहा है कि भारत का माहौल दिनों -दिन खराब होता जा रहा है और लोग धार्मिक रूप से सहनशील कम होते जा रहे हैं।
सहिष्णुता - असहिष्णुता के मुद्दे को लेकर संसद से लेकर सड़कों तक बहस जारी है।
मूल प्रश्न यह है कि,  क्या सचमुच हम(भारतीय) असहिष्णु होते जा रहे हैं ?
इसे समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा और साथ ही विश्व के अन्यान्य देशों पर भी दृष्टिपात कर लेना चाहिए। फिर तस्वीर साफ होगी कि क्या सचमुच हम असहिष्णु होते जा रहे हैं या फिर ऐसे आरोप सच से परे हैं।
पहले हम अतीत में लौटते हैं। हमारे देश में लोकनायक वही हो सकता है जिसमें समन्वय की अपार क्षमता हो। महात्मा बुद्ध हो , सम्राट अशोक हो ,बादशाह अकबर हो या फिर महात्मा गाँधी । साहित्य के क्षेत्र में गोस्वामी तुलसीदास ने समन्वय का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया है।
हमारा भक्ति आन्दोलन और सूफी आन्दोलन भी इसी का उदाहरण है। जिसने भी मलिक मुहम्मद जायसी के पद्मावत को पढ़ा होगा उसे ये ज्ञात होगा कि एक सूफी कवि फारसी के स्थान पर अवधी भाषा में काव्य रचना करता है और वह हिन्दू देवी देवताओं का गुणगान करते हैं। जायसी की सहानुभूति अलाउद्दीन खिलजी के साथ नहीं बल्कि राणा रत्नसेन के साथ है।
दो सहस्राब्दी पूर्व सम्राट अशोक ने अपने शिला प्रज्ञापनों में धार्मिक-सहिष्णुता के सम्बन्ध में जो बातें लिखवायी थी वो आज भी प्रासंगिक व सम्पूर्ण संसार के लिए दिशाबोधक हैं। ...वो कहते हैं कि धर्म के सारतत्व वृद्धि पर ध्यान देना चाहिए और इसका मूल है "वाणी संयम"। लोगो को मौके- बेमौके अपने सम्प्रदाय की प्रशंसा व दूसरे के सम्प्रदाय की निंदा नहीं करनी चाहिए। इसके विपरीत एक न एक कारण से अन्य धर्मों का आदर करना चाहिए और ऐसा करके व्यक्ति अपने सम्प्रदाय की वृद्धि तो करता ही है साथ ही दूसरे सम्प्रदाय का उपकार। जबकि इसके विपरीत आचरण अपने धर्म को हानि पहुँचाता है और साथ ही दूसरे सम्प्रदाय का अपकार भी।जो को अपने सम्प्रदाय के उन्नति की लालसा से दूसरे धर्म की निन्दा करता है वह वस्तुतः अपने धर्म की ही बहुत बड़ी हानि करता है। इसलिए लोग एक-दूसरे के धम्म को सुने , इससे सभी सम्प्रदाय बहुश्रुत होंगे और संसार का कल्याण होगा।
इसी तरह गुप्तकाल में समाज, धर्म, संस्कृति, राजनीति, कला आदि में एक छोर से दूसरे छोर तक समन्वय, मेलजोल व सहिष्णुता दिखायी देती है।
मुगल शासन के दौरान विशेषकर सम्राट अकबर ने "सुलह-ए-कुल" के माध्यम से सम्पूर्ण देश को एक सूत्र में बाँधने का अद्भुत प्रयास किया। अकबरकालीन वास्तुकला को देखने से सहज ही अनुमान लग जाता है कि वह हिन्दू, बौद्ध, फारसी, तुर्की इत्यादि सभी परम्पराओं को अपनाने को व उनके समामेलन को तैयार रहता था।
इन विराट समन्वयात्मक प्रयासों को बीच-बीच में झटके भी लगे पर वे भारतीय मूल आत्मा (सहिष्णुता व सहनशीलता) को कोई विशेष व स्थाई हानि नहीं पहुँचा पाये।
जैसे मौर्य-काल के बाद पुरोहितों ने "वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति" तो अकबर के समय "इस्लाम खतरे में है" का नारा बुलंद किया गया।
और तो और महात्मा गाँधी की हत्या उन्मादी गोडसे द्वारा किया जाना ...हिन्दू धर्म पर आसन्न संकट को टालने के लिए कर दिया जाना ...भी हमारी सहिष्णुता की चूलें नहीं हिला पाया...
भारत सहिष्णु है और सहिष्णु रहेगा ...छिटपुट घटनाओं को छोड़ दें तो भारत एक शान्तिप्रिय देश है...यहाँ पर संसार के सभी धर्मावलंबी एक साथ रहते हैं, सभी नस्ल के लोग साथ रहते हैं...गोरे हो या काले , नाक चपटी हो या तोते जैसी, ठिगने हो या लम्बे...सब साथ -साथ रहते हैं।
किसी भी देश में जब दूसरा धर्म आता है तो पूर्व धर्म का मूलोच्छेदन हो जाता है ...ईरान में जब इस्लाम आया तो वहाँ से पारसी धर्म खत्म हो गया...भारत में आज जो भी पारसी समुदाय है वह ईरान से आये हुए शरणार्थी लोग हैं।
भारत में ईसाई धर्म प्रथम शदाब्दी में ही आ गया था। भारतीय शासकों ने सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता की नीति अपनाई चाहे वो हिन्दू शासक हो या मुस्लिम।
वर्तमान में सहिष्णुता व असहिष्णुता पर जो बहस चल रही है उसे हमें विश्व के अन्य देशों से तुलना करके पता चल जायेगा कि कितनी सच्चाई है ?
पहले आस्ट्रेलिया से शुरू करते हैं, अंग्रेजों ने जब यहाँ बसने का निर्णय ले लिए तो उन्होंने एक तरफ से यहाँ के मूल वासिन्दों का संहार कर डाला और बहुसंख्यक बन बैठे ।...इसी तरह USA में गोरों ने वहाँ के आदिवासियों, रेड-इंडियनों के सफाये में कोई कसर नहीं छोड़ी...न्यूजीलैंड में भी यही किया गया...दक्षिण अफ्रीका की नस्ल-भेद(Apartheid) नीति १९९० के बाद नेल्सन मंडेला के राष्ट्रपति बनने के बाद ही खतम हो सकी...तथाकथित विकसित देशों से नस्लीय भेदभाव व धार्मिक असहिष्णुता के समाचार आते रहते हैं।
इजराइल-फिलिस्तीन का संघर्ष हो या खाड़ी देशों में धार्मिक उन्माद, सीरिया समस्या हो या उसी क्षेत्र में शिया-सुन्नी विवाद ...सब के सब हिंसा के सहारे दुसरे धर्म व नस्ल का विनाश करने पर तुले हुए हैं।
आजादी के समय पाकिस्तान में लगभग १५% हिन्दू थे जो अब ५% से भी कम रह गये हैं। बात बिलकुल आइने की तरह स्पष्ट है।
भारत की स्थिति बिल्कुल अलग है, यहाँ की मिट्टी व जलवायु में ही कुछ ऐसा है कि ...intolerant Islam यहाँ आकर Tolerant हो जाता है वह सुलह कुल की बात करने लगता है और सूफी वाद से प्रभावित होता है।
मैं दावे के साथ सीना ठोंककर कहता हूँ कि भारतीय मुसलमान दुनिया के अन्य मुसलमानों से अलग है, वह खाड़ी देशों के मुसलमानों व पाकिस्तानियों की तरह हिंसक नहीं है, वह सह-अस्तित्व में विश्वास करता है।
एक बात जो मैने अनुभव की है वह ये कि ...असहिष्णुता की सारी चोंचलेबाजी भारतीय शहरी मध्यम वर्ग व राजनीतिज्ञों की देन है।
भारत तो गाँव में बसता है और गाँव सम्पूर्ण रूप से सहिष्णु है, सह-अस्तित्व में विश्वास करता है ...बेशक गाँवों में बहुत समस्याएं हैं, गरीबी, अल्पविकास, अंधविश्वास ...फिरभी गाँव असहिष्णु बिल्कुल भी नहीं है।
शहरों में भी कुछ ज्यादा विचारवान लोग हिन्दू /इस्लाम खतरे में है का नारा उछाल दिया करते हैं और अपना स्वार्थ-साधन करते हैं।
मेरा अनुरोध है कि ...ये खतरे वाला नारा जो भी लगाये ...उसे तुरन्त Unfriend कीजिए ...ये विषाणु हैं, या यू कहें कि अछूत बीमारी है ये...ये भारत के दुश्मन हैं ...इनसे दूर रहना है हमें ...
भारत हम सबका है, धर्म का मामला व्यक्तिगत है, लोकहित व देशहित सर्वोपरि है  , धर्म इसके आड़े नहीं आना चाहिए।
"धर्म की सार्थकता समाज को जोड़ने में है न कि उसे तोड़ने में "। ...यदि धर्म समाजिक विद्वेष फैलाने लगे तो वो अपनी सार्थकता खो देता है और ऐसा धर्म पराभव की तरफ बढ़ने लगता है, इसीलिए उसमें समयानुकूल परिवर्धन व परिष्कार की जरुरत होती है।
भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा है -
"सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुखभाग भवेत्।।"
अर्थात् धर्म है
"परहित सरिस धर्म नहिं भाई।
परपीड़ा सम नहिं अधमाई।।"
परन्तु धर्म का अर्थ ही हम कुछ और लगा बैठे हैं। धर्म के नाम पर एक दूसरे की हत्या अस्वीकार्य है। ये धर्म नहीं अधर्म है।

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

नारी और रजोधर्म पर पवित्रता व अपवित्रता विवाद

मंदिर में देवीरूप की पूजा,
और उसी नारी का मंदिर-प्रवेश-निषेध !!!
संदर्भ -सबरीमाला मंदिर पर माननीय उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी
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सबरीमाला मंदिर केरल में पश्चिमी घाट के पेरियार के समीप स्थित है। यहाँ पर प्रति वर्ष लगभग १० करोड़ तीर्थयात्री दर्शनार्थ आते हैं, जोकि संख्याबल के आधार पर विश्व में स्थान रखता है।
इस मंदिर में पुरुषों के प्रवेश पर कोई रोक नहीं है। लेकिन महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया जाता है। सामान्यतः १० से ५० वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं का प्रवेश निषिद्ध किया गया है। और इसका कारण ये दिया गया है कि इस आयु वर्ग की स्त्रियों को रजोधर्म आता है और वे अपवित्र रहती हैं और इसका आधार लिया जाता है कि मंदिर के देवता "अयप्पा" अविवाहित / ब्रह्मचारी थे।
इस भेदभाव के विरुद्ध "युवा अधिवक्ता संघ" विगत १० वर्षों से मंदिर का प्रबंधन देखने वाली संस्था"ट्रावनकोर देवासम् बोर्ड" से न्यायिक लड़ाई लड़ रहा है।
माननीय उच्चतम् न्यायालय के न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति एनवी रमण की पीठ ने कहा, 'मंदिर धर्म के आधार के अलावा प्रवेश (महिलाओं का) वर्जित नहीं कर सकता। जब तब आपको संवैधानिक अधिकार प्राप्त न हो, आप प्रवेश वर्जित नहीं कर सकते।' {The temple cannot prohit the entry (women), except on the basis of religion . Unless you have a constitutional right, you cannot prohit entry}
न्यायालय ने टिप्पणी की कि इस परंपरा को किसी संवैधानिक व्यवस्था का समर्थन प्राप्त नहीं है।
न्यायालय ने सरकार से जानना चाहा कि क्या यह सही है कि पिछले 1500 साल से महिलाओं को मंदिर परिसर में प्रवेश की अनुमति नहीं है। पीठ ने टिप्पणी की कि यह सार्वजनिक मंदिर है और हर व्यक्ति को इसमें जाने का अधिकार होना चाहिए। अधिक से अधिक वहां धार्मिक प्रतिबंध हो सकता है, लेकिन सामान्य प्रतिबंध नहीं।
 माननीय उच्चतम् न्यायलय ने इसी तरह के एक मामले में,  "श्री मीनाक्षी अम्मान मंदिर " मदुरई ,तमिलनाडु के संबंध में निर्णय सुनाया था कि, "संवैधानिक वैधता अनिवार्य रूप से सभी प्रकार के धार्मिक विश्वास या प्रथा/व्यवहार पर अभिभावी होगी।"{ Constitutional legitimacy must supersede all religious beliefs or practices.} इसी निर्णय में न्यायलय ने कहा था कि मंदिर का पुजारी अब्राह्मण भी हो सकता है। अर्थात् अब मंदिर पर ब्राह्मणों की इजारेदारी नहीं चलेगी।
माननीय न्यायलय लैंगिक भेदभावपूर्ण रवैये पर अगली सुनवाई फरवरी में करेगा,  पर उसकी टिप्पणियाँ स्वागत योग्य हैं।
एक स्त्री रजोधर्म के दौरान अपवित्र क्यों ?
इस पर मुझे सिर्फ इतना कहना है कि जो मानसिक दीवालिये नारी को अपवित्र मानते हैं वो स्वयं अपवित्र हैं, उनकी सोच गंदी है।
नारी ही सृजनशक्ति है उसी से जीवन की शुरुआत है। उसी के शरीर में जीवन ढलता है। जिसे ये गंदी सोच वाले अपवित्रता कहते हैं वहीं से जीवन की शुरुआत होती है।
जिसे समझना होगा वो एक फूल को देखकर समझ सकता है,क्योंकि एक फूल को ध्यान से बैठकर कुछ समय तक निहारने पर प्रकृति के सारे रहस्य हृदयंगम् हो जायेंगे। और जिसे नहीं समझना उसे ब्रह्मा भी नहीं समझा सकते ठीक उसी तरह- जैसे, चाहे जितनी अच्छी बारिश हो बेंत में फूल व फल नहीं लगते।
स्त्री सम्माननीय हैं और शक्ति-स्वरूपा हैं। ये तो हम केवल नवरात्रि में प्रदर्शित करते हैं पर क्या व्यवहार में ऐसा कर पाये ?
"क्या जरूरत ऐसे सिद्धांत की,
कि 'यत्र नार्यस्तु पुज्यंते रमंते तत्र देवता' ;
और वही घोषित -"स्त्री न स्वातंत्र्यमर्हति" !
लड़ाई तुम्हारी है लड़ना तुम्हें ही पड़ेगा
मंदिर में देवीरूप की पूजा,
और उसी नारी का मंदिर-प्रवेश-निषेध !!!
जिससे बना शरीर हमारा,
वही अपवित्र हो गयी,
और हम पवित्र  ?
यह कैसा दोगलापन ,
सिद्धांत कुछ और पर व्यवहार कुछ और,
हमेशा नारी शोषण को आतुर पुरुष,
घर व बाहर !
अस्तित्व का एहसास निहायत जरुरी है !
हर रूप और कौशल का प्रदर्शन जरुरी है !
स्व-अस्तित्व के सबूत, तुम्हें खुद प्रस्तुत करना होगा !
अधिकार की मांग और अस्मिता के गान खुद बुलंद करना होगा !
पुरुषों ने आखिर तुम्हें कब कुछ दिया है -दुत्कार और धिक्कार के सिवा ?
हाँ संभालना तुम्हारा व्यवहार रहा है !
पर कब तक ???
और जो भी इस लक्ष्मण रेखा को पार करने की हिमाकत करे !
उसके लिए तुम माफ़ी शब्द भूल जाओ!
उसे भय और खौफ के खम्भों से बांध कर !
बलि-देवी का बुलावा दे दो !
लड़ाई तुम्हारी है और लड़ना भी तुम्हीं को पड़ेगा !
क्योंकि;
विकर्ण सभा से निकाल दिये जाते हैं,
किसन भी मदद को अब नहीं आते हैं !
निर्भीक निडर और निर्विकार हो स्वीकार करो ,हे नारी !!!"
रजोधर्म की जानकारी हेतु लिंक
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http://www.jsk.gov.in/hindi/puberty.asp
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सोमवार, 11 जनवरी 2016

रुपहला पर्दा और दलित अस्मिता


"आज दमित-शोषित वर्ग में भी दशरथ माँझी सरीखे संघर्षरत लोगों की कमी नहीं है। परन्तु वे रुपहले पर्दे का कथ्य नहीं बन पाते हैं।... हमारे धर्म-ग्रंथ जो गरीब के रूप में यही कहानी लिखते रहे हैं कि ...एक गरीब ब्राह्मण था ...नायक हमेशा एक सम्भ्रांत कुलीन राजकुमार ही होता था ...की मानसिकता से हमारा सिनेमाई संसार आज भी नहीं निकल पा रहा है ...उसकी दृष्टि में बाजीराव सिंघम व चुलबुल पाण्डेय पर जाकर अटक जाती है ...हिंदी फिल्मों में देवी-देवता होते हैं ...नारी  सबला नहीं अबला दिखाई जाती है और हीरो आकर उसकी इज्जत बचाकर उसके दिल को जीत लेता है ...मंदिर में घंटे बजाकर अथवा मस्जिद में नमाज पढ़कर समस्याओं का समाधान मांगा जाता है ...ये है हमारी फिल्मों का कथ्य ...ग्रामीण परिवेश गायब ...सारे के सारे कैनवास जो फिल्मों में बुने जाते हैं  हवाहवाई होते हैं ...वास्तविकता से कोसों दूर ...केवल और केवल व्यावसायिकता ...।"
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भारत में फिल्में मात्र मनोरंजन का साधन ही नहीं हैं  बल्कि समाज का आईना भी हैं और समाज को सोचने पर विवश भी करती हैं। फिल्मों में दलित व दलित-स्त्री समस्याएं भी उठाये गये हैं। आप लोगों ने भी देखें होंगे । इस दृष्टिकोण से आइये कुछ फिल्मों को चुनकर इस समस्या पर मंथन करें जिनमें इस पर प्रमुखता से विचार किया गया है।
(क)-औपनिवेशिक काल की फिल्में
       १-खुदा की बात; १९३० -आर०एस०चौधरी
       २-चंडीदास; १९३४-नितिन बोस
       ३-धर्मात्मा; १९३५-वी०शान्ताराम
       ४-अछूत कन्या; १९३६-फ्रेट्स आस्टन
       ५-अछूत; १९४०-चन्दूलाल शाह ।
(ख)-स्वातंत्र्योत्तर काल की फिल्में
       १-सद्गति; १९८१-सत्यजित राय(प्रेमचंद की कहानी)
       २-दीक्षा; १९९१- अरुण कौल
       ३-समर; १९९९-श्याम बेनेगल
       ४-सुजाता; १९७९-विमल राय
       ५-दो बीघा जमीन-विमल राय
       ६-पार -गौतम घोष
       ७-दामुल; १९८५ -प्रकाश झा
       ८-आक्रोश
       ९-समय
       १०-लगान
       ११-आरक्षण
       १२-मांझी द माउंटेन मैन ।
बोलती फिल्मों के निर्माण की शुरुआत (१९३१) तक राष्ट्रवाद और दलित-विमर्श की दिशाएँ विपरीत हो चुकी थीं। अधिकांश साहित्यकार, चित्रकार और रंगकर्मी शहरी व उच्चवर्गीय थे ।उनके राजनीतिक सरोकार दलित समस्याओं से न के बराबर थे । हिन्दी सिनेमा भी इस आग्रह से बच न सका । उस समय (औपनिवेशिक काल) अधिकांश फिल्में बंम्बई या कलकत्ता में बनती थीं ।
फिल्म "अछूत कन्या" में एक दलित लड़की 'कस्तूरी' एक ब्राह्मण युवक 'प्रताप' परस्पर  प्यार करते हैं परन्तु हिन्दू समाज को यह अस्वीकार्य है। कस्तूरी का विवाह उसके ही दलित परिवार में हो जाता है। एक दिन अचानक कस्तूरी और प्रताप की मुलाकात मेले में हो जाती है। कस्तूरी के पति को यह मुलाकात पूर्व-नियोजित लगती है और वह प्रताप से लड़ बैठता है। दोनों लड़ते-२ रेलवे क्रासिंग पर आ जाते हैं। रेल आने वाली है। कस्तूरी उन्हें बचाने के चक्कर में खुद रेल के पहिए के नीचे आ जाती है। "इस तरह एक अछूत लड़की अपने जीवन का बलिदान कर देती है ताकि समाज के सवर्ण व अवर्ण शांति से रह सकें।" वैसे इस फिल्म में अस्पृश्यता का मुद्दा अछूता ही रह गया है।
फिल्म "अछूत" गाँव के कुएँ से पानी पीने , मंदिर में दलित प्रवेश के मुद्दे और बाध्य होकर धर्म परिवर्तन के मुद्दे को उठाती है। अंतत: मंदिर प्रवेश व पानी पीने में कुएँ का उपयोग जैसे पेचीदा मुद्दे का समाधान गाँधीवादी तरीके से किया गया है जो कि वायकोम सत्याग्रह (१९२७) की प्रतिध्वनि है।
फिल्म  "सद्गति" में घासीराम-ब्राह्मण, दुखी-अछूत और मनुरिया (दुखी की पत्नी) प्रमुख पात्र हैं। बीमार दुखिया का लकड़ी चीरना , घासीराम की संवेदनहीनता और धार्मिक आडंबर और अंत में लकड़ी चीरते -चीरते दुखी की मृत्यु, फिल्म तो नहीं लेकिन जिन्होंने मूल रूप से प्रेमचंद की पढ़ी है अंदर तक हिल जाते हैं।
फिल्म "दीक्षा" भी सद्गति की तरह ही ब्राह्मणों के कर्मकांडों पर प्रश्न उठाती है, लेकिन जातिव्यवस्था से मुक्ति का समाधान नहीं प्रस्तुत करती है।
फिल्म "समर" म०प्र० के एक गाँव की सच्ची घटना(९०का दशक) पर आधारित है। कुल्ल गाँव में जिसमें दलित अधिक थे , एक हैंडपंप लगाया गया , जिसका विरोध राजपूत जाति के सरपंच व उसके गुर्गों द्वारा किया गया। कुल्ल गाँव में दलित उत्पीड़न का इतिहास काफी पुराना है। बात बात पर पिटाई, कोड़े लगाना, यातनाएँ देना व अपमानित करना आम बात थी। ...लेकिन अन्य फिल्मों की तरह ही समर भी दलितों के प्रति शहरी, सवर्ण समाज की दया-दृष्टि का प्रतीक बनकर रह गयी है।
फिल्म  "सुजाता" एक अछूत लड़की की कहानी है। यद्यपि फिल्म में दलित युवती को सहानुभूतिपूर्वक दिखाया गया है और गाँधी की प्रतिमा भी सुजाता के दुख से रो पड़ती है।  गाँधी जी द्वारा अपने सवर्ण अनुयायियों के विरोध के बावजूद अछूत लक्ष्मी को शरण देने का प्रसंग भी आता है। तथापि यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि दलित आंदोलन के मुखर नेता ज्योतिबा फूले व डॅा० अम्बेडकर का जिक्र तक नहीं इस फिल्म में। यह एक तरह से अछूत के प्रति सवर्णवादी समाज के दयावादी सोच है न की उनके अधिकारों का ही प्रतिबिंब है। दलित नायिका जन्मजात दलित-जाति में जन्म के कारण हीन भावना से ग्रसित दिखती है और उसके मन में अपने समाज से भेदभाव के प्रति आक्रोश नदारद है । वह दलित अस्मिता से शून्य है । यहाँ भी गाँधीवादी सोच हावी है । यह उल्लेखनीय है कि दलित विमर्श स्वाभिमान व अधिकारों की बात करता है (ज्योतिबा फूले व डॅा० अम्बेडकर) न कि सवर्णों की दयादृष्टि से कुछेक सुविधा की।
फिल्म  "पार" में दलित शोषण-दमन को ईमानदारी से दिखाने का प्रयास किया गया है । दलित वर्ग लाचार व निरुपाय होकर दमन व शोषण से बचने के लिए एक सुनहरे स्वप्न को साकार करने के लिए शहर का रुख करता है परन्तु वहाँ भी उसे निराशा हाथ लगती है। सुअरों को नदी पार कराते समय स्मिता पाटिल का गर्भपात हो जाता है - अर्थात् इस जीवन में तो कुछ मिला नहीं उलटे पाने की लालसा में भावी पीढ़ी भी नष्ट हो गयी। दलित जीवन के पास कुछ न होने से शुरू होकर कुछ पाने की कोशिश में सब कुछ गंवाने का की लहूलुहान यात्रा का दस्तावेज है फिल्म "पार"।
फिल्म  "दामुल" में एक प्रमुख मुद्दा उठाया गया जिसमें दलित-वर्ग को गाँव छोड़कर शहरों की ओर पलायन को रोक दिया जाता है लाठी के बल पर।
फिल्म  "समर" ९० के दशक की एक सच्ची घटना पर आधारित है।  कहते हैं कि मंदिर में प्रवेश की सजा के नाम पर ठाकुर ने एक दलित के सर पर भरी पंचायत में पेशाब कर दिया था ।
यदि हम फिल्मों में दर्शाये गये दलित-शोषित वर्ग पर एक सरसरी निगाह डालें तो एक बात स्पष्ट हो जायेगी। दलित वर्ग को फिल्मों में सतही तौर पर ही छूने का प्रयास किया गया है। "लगान" फिल्म के एक पात्र "कचरा" से यह बात स्पष्ट हो जाती है । क्या मजाक बनाया गया है दलितों का ? एक हाथ मुड़ा हुआ तथाकथित हीरो भुवन की रहमोकरम पर निर्भर है वह । इससे विदेशों में (क्योंकि यह आस्कर) के लिए गयी थी, भ्रम हो सकता है कि वास्तविक जीवन में दलित ऐसे होते हैं। भुवन , फिल्म का नायक एक द्विज है, क्या वह शूद्र नहीं हो सकता ? अथवा कचरा द्विज क्यों नहीं हो सकता ? ...फिल्मों में ज्यादातर दलित पात्रों को या तो नकारात्मक दिखाया जाता है अथवा निरीह । " दबंग" पिक्चर का हीरो एक पाण्डेय है न कि कोई दलित।  ...वास्तविक जीवन में संघर्ष करता दलित फिल्मी लेखकों को दिखाई ही नहीं देता है। ...या यों भी कह सकते हैं उनकी व्यवसायिक मजबूरियां हैं क्योंकि  "मांझी द माउंटेन मैन" उतना नहीं कमा पाती जितना कि "बजरंगी भाईजान" जैसी दो कौड़ी की काल्पनिक फिल्में ।
फिल्म "आरक्षण" अपने नाम के प्रतिकूल शिक्षा के व्यावसायीकरण पर केंद्रित है और दलित समस्या को व सवर्ण के बीच एक संतुलन साधती है , परन्तु सतही रूप से ।
"हंस" पत्रिका को दिये गये इंटरव्यू में हेमामालिनी ने बताया कि धर्मेंद्र ने उनकी तारीफ में कहा था "You have Aryan features" अर्थात् तुम्हारे नैन-नक्श आर्यों जैसे हैं। अभिनेता धर्मेंद्र का यह कथन हमारी फिल्मी दुनिया के जातीय विश्लेषण प्रस्तुत करता है। भारतीय राजनीति और न्यायपालिका की तरह फील्मी दुनिया में भी कुछ जाति-परिवारों का वर्चस्व है। इसमें दलितों का "प्रवेश-निषेध" अघोषित रूप से पालन होता आ रहा है। हालांकि एकाध दलित (शैलेंद्र) पहुँच भी जाते हैं तो व्यावसायिक मजबूरियां उन्हें विवश कर देती हैं और वे दलित जीवन को नहीं उकेर पाते हैं।
आज दमित-शोषित वर्ग में भी दशरथ माँझी सरीखे संघर्षरत लोगों की कमी नहीं है। परन्तु वे रुपहले पर्दे का कथ्य नहीं बन पाते हैं।... हमारे धर्म-ग्रंथ जो गरीब के रूप में यही कहानी लिखते रहे हैं कि ...एक गरीब ब्राह्मण था ...नायक हमेशा एक सम्भ्रांत कुलीन राजकुमार ही होता था ...की मानसिकता से हमारा सिनेमाई संसार आज भी नहीं निकल पा रहा है ...उसकी दृष्टि में बाजीराव सिंघम व चुलबुल पाण्डेय पर जाकर अटक जाती है ...हिंदी फिल्मों में देवी-देवता होते हैं ...नारी  सबला नहीं अबला दिखाई जाती है और हीरो आकर उसकी इज्जत बचाकर उसके दिल को जीत लेता है ...मंदिर में घंटे बजाकर अथवा मस्जिद में नमाज पढ़कर समस्याओं का समाधान मांगा जाता है ...ये है हमारी फिल्मों का कथ्य ...ग्रामीण परिवेश गायब ...सारे के सारे कैनवास जो फिल्मों में बुने जाते हैं  हवाहवाई होते हैं ...वास्तविकता से कोसों दूर ...केवल और केवल व्यावसायिकता ...।

चाँद के साथ एक रात

चाँद हमेशा ही प्यार की निशानी रहा हैं हमेशा दिल ही की तड़प में प्रिय का साथ देता हैं ।  प्यार के इस अहसास को चाँद बिन कहे ही समझता हैं । कोई साथ हो न हो चाँद हमेशा आँसू पोंछता हैं ।
"...तो आज फुरसत भी है, और तनहाई भी,
आ चाँद बैठकर गुफ्तगू करते हैं,
कुछ हाल-ए-बयाँ हम करते हैं,
एहसास-ए-दिल शेयर करते हैं,
तेरे शिवा कहें तो कहें किससे ?
क्योंकि,
कुछ तो कामन है अपने में ...
आगाज-ए-बयाँ कहाँ से करें ?
चलो फ्लैश बैक करते हैं,
बचपन में चलते हैं,
जब तू अपुन का मामा हुआ करता था..."
सबसे पहले तो वो याद आता है जब हम रूठ जाते तो माँ हमको मनाते हुए चंदा मामा को दिखाकर हमें सुलातीं थी...
गाना गाती थीं ..."चंदा मामा दूर के ...किया पकाये पूर के ...आप खाये थाली में ...मुन्ना को दे प्याली में ..."  वैसे इसकी यादें बहुत ही धुंधली या यूँ कहें न के बराबर की यादें हैं ...
सूरदास जी ने भी तो लिखा है ..." मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों... जैहों लोट धरनि पर अबहीं तेरी गोद न ऐहों..."
अब चंदा को ही देख लीजिए ...बचपन में हमारे मामा थे, आराधना मूवी की माँ अपने बच्चे में उसका अक्स देखती है ..."चंदा है तू , मेरा सूरज है तू ..."
और अब, जबकि हम युवा हो गये तो चंदा की तुलना अपने महबूब से करने लगे कोई शिकायत हो तो उसी को दृष्टिगत रखकर करते हैं ...जैसे जब हम रात भर जगें और कोई साथ देने वाला न हो तो ...चांद साथी बन जाता है ...क्योंकि हम उससे कह सकते हैं कि ..."चांद को ढूंढे पागल सूरज , शाम को ढूंढे सबेरा , मैं भी ढूंढू उस प्रियतम को हो न सका जो मेरा..." तो रात को जागकर अक्श-ए-महबूब चाँद में ही देखकर शिकायत करते रहते हैं ...जैसे रात भर वो जागता है हम भी जागते हैं ...लेकिन एक अंतर है ...वो जलता नहीं शीतल रहता है ...पर वियोगी युवा मन आफताब की तरह जलता है शीतल रात में भी ...
"...हम भी बेकरार,
तू भी बेकरार;
तुझको न चैन,
न मुझे करार;
तू बेचैन आफताब के लिए,
और मैं अपने माहताब के लिए;
हम दोनों की आंखों में नीदें ,न दिल में करार ;
किसने चुराई नींद-ओ-करार ?
फिरभी ये चैन की कोई तो है साथी-ए-तन्हाई..
शुक्रिया चंदा..."
फिर मन किया लाओ थोड़ा चापलूसी कर दूँ चाँद की, नहीं तो उठकर अगर चल दिया तो हम हाल-ए-बयाँ किससे करेंगे  ?
"...ऐ चाँद ! इतराये न क्यूँ तू ?
क्योंकि तेरे मौन ने ललकार कर पुकारा है
 सब आशिक हैं तुम्हारे, कौन हमारा है ?
 नूर-ए-बरसात होती है तुझसे,
 चिलमन भी न छुपा सके ऐसा रूप है तुम्हारा,
तुम नहीं तो चाँदनी कहाँ ?
मुहब्बत ने भी तुम्हीं को पुकारा है,
माहताब हो,  ख्वाब हो, धड़कते हो दिलों में,
सहारा-ए-आशिकी हो,
नहीं तो रात की तनहाई में कैसे होता गुजारा,
शायरी मंझधार में ही डूब जाती,
कलम के शाहिल बन जाते हो,
व सम्बल हमारा,
और तो और दिलों पर राज है तुम्हारा
इसीलिए ,
ऐ चाँद ! तू सबसे है न्यारा ..."
"...ऐ चाँद ! तथागत जब आये तो तू पूरे शबाब पर था, और गये तब भी ...क्या इसीलिए उनकी आँखों करूणा व प्रेम छलकता था...हमारे यहाँ माँ हमें चाँद को देख मनाती और चाँद को फीका कहती हमसे ...तो तुझे ही देख सुहागन करवा-चौथ व्रत तोड़ती...अब ये भी देखो कमाल हो जाता है, मुस्लिम भी ईद का चाँद देख निहाल हो जाता है..."
...फिर मैने सोचा कि लाओ मेरी बातों में मशगूल चाँद को छू लूँ
होकर बेकरार मेरी भावनाओं में एक ज्वार आया..
आगे बढ़ती लहर लहर
आकाश की तरफ़
भूला मैं मर्यादा
ऊपर और ऊपर
शैलाब सा आ गया जज्बात का,
लेकिन ये क्या ?
माहताब तो दूर बहुत दूर
हम छू न सके
लहरे बिखरकर गिरीं रेत पर
जज्बात बिखर गये
मैं हारा, थका , स्तब्ध,
होकर असफल
लौटा उसी जगह
बिल्कुल शान्त और क्लांत,
कुछ समय विचार शून्य,
बचा सिर्फ चाँद का अक्स
सिर्फ अक्स , अपने ही भीतर
बस महसूस बस महसूस ..."
...फिर सोच की दिशा बदली और चाँद का एक और ही रूप पाया...
...कितनी नाइंसाफी करते हैं हम चाँद के साथ,
 सदियों से ‘नाइट-शिफ्ट’
‘वीकेन्ड’ पे भी फुरसत नहीं,
मंथ में वनली वन हॅालीडे,
उसी में सब करना
कपड़े धुलना व सुखाना,
जब वो बहुत परेशां
तो चन्द्रग्रहण के दिन वो
झूठी ‘सिक-लीव’ पर चला जाता
अरे उसको भी तो आराम चाहिए ?
करे भी का बेचारा,
पूरी रात जागता,
सांसद तो अपना बेतन बढ़ा लेते,
पर उसका सदियों से फिक्स,
इसीलिए 'सैलरी-डे’ वाले दिन
चाँद कुछ ज्यादा ही चमकता है
फिर जैसे घटती ‘सैलरी’ वैसे वो चमक घटाता जाता है,
लेकिन हमरा समझ में नहीं आता है ?
क्यूं लोगों को
चाँद में माशूका नजर आता है ?
मुझे तो दिखता है
वो हैरान, परेशान
पूरी ड्यूटी के बाद भी
जिसकी सेलरी कम है
और वो भी बिना मुट्ठी गरम् किये नहीं पाता,
अब बताओ चांद भी हमारे देश के क्लर्कों से परेशान,
अब वो मुंशिफ-ए-तकदीर से फरियाद करने को सोच रहा,
कि हमका भारत से रुख्सत कर दो
ये लोग बहुतै करप्ट हैं ..."
फिर भावना का हिलोर उठा और फना होने का मन करने लगा, ऐ चाँद ! तू भी तो सूरज को खोजता फिरता है ...तो मैं क्यों न...???

"...चलो कुछ नापते हैं
तुम जरा चाँद वाली छोर पकड़ना,
हम सूरज वाली पकड़ते हैं,
देखें कितना फासला है हम दोनों के दरमियाँ ,
और फिर सिमट जाए दूरी इतनी कि
फसला न रहे माहताब-ओ-आफताब में ,
कोई डोर ना बचे दरमियाँ...
दूरियाँ हमारे बीच की न रह जाएँ,
हम एक हो जाएँ,
कोई सिरा न खोज पाएँ,
आओ कुछ ऐसे ही मोहब्बत करते हैं ,
चलो चाँद व सूरज को फना करते..."